शनिवार, 3 सितंबर 2011

राधा और सुदामा

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई , देश मे दंगे हुए और इन्ही दंगो के दौरान 4 नंवबर 1984 को मेरा जन्म हुआ । यही कारण है की भगवान ने मुझे जल्दबाजी मे बनाकर फेंक दिया और मै ताउम्र इंदिरा गांधी को कोसता रहा की थोड़ा लेट नही मर सकती थी ।

बचपन से ही मै स्कूल कार्यक्रम मे कृष्ण का रोल पाना चाहता था पर ब्राम्हण था तो सालों को मै सुदामा के रोल के लिये ही उपयुक्त नजर आता था । ये बात और है की इस कलयुग मे कई बार राधा कृष्ण के बजाय सुदामा से ही फंसती थी , क्योकी भिक्षा के पैसों का चाट गुपचुप सुदामा ही खिलाता था और बदले मे राधा को जी भर कर निहारा करता था ।

मै बचपन से ही सौदर्य का मारा था, इसलिये शादियों मे जाना और लड़कियो को जी भरकर निहारना, मेरा पंसदीदा काम था , मेरे पास इसके लिये एक तर्क भी था की आंखे कमजोर न हो इसलिए विटामिन A ले रहा हूं , कई बार ऐसा भी हुआ की लाजवाब पकवान की जगह मैने विटामिन A को तरजीह दी और जब पकवान का मजा लेने जाता, तो खाली बर्तन मुझे चिढ़ा रहे होते फिर मै घर आकर मम्मी के मुँह से गालियों के साथ सुबह के चावल का मजा लेता और अगली सुबह जब मेरी बहन पूछती की कल शादी मे कैसा इंतजाम था और क्या खाया तूने तो मेरा जवाब होता “ फ्राई राईस विथ अचार “ , वो कभी नही समझ पाती की आखिर य़े कैसा इंतजाम था । मुझे बचपन से ही ये गलतफहमी थी की शादी घर मे सब मेरे लिये ही तैयार हो कर आई है और ये भ्रम मैने कभी टूटने भी नही दिया ।

मै बचपन से ही एक लक्ष्य वाला था इसलिये जिसे भी देखता उसे तब तक देखता जब तक वो मुझे न देख ले और खुदा गवाह है इस बात का मैने कभी भी जाति-धर्म, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब को तरजीह नही दी, जिसने भी गलती से एक बार मेरी ओर देख लिया उसे मैने तब तक देखा, जब तक उसने मुझे आँखो ही आँखो मे ये न कहा की “ क्या देख रहा है बे ” या पार्टी छोड़कर चली न गई ,उसके जाने के बाद मै खुद को समझा लेता की बेचारी को जल्दी थी इसलिये चली गई नही तो ध्यान तो पूरा दे रही थी । सिलसिला जारी है बस छोटा सा विराम है और इंतजार है तो तुलसी विवाह का.............................................

1 टिप्पणी:

  1. विवेक जी किसी फिल्म का एक संवाद था की किसी भी चीज़ को शिद्दत से पाने की तमन्ना करो तो पूरी क़ायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में लग जाती है...मुझे यह डॉयलाग बेहद पसंद आया था जो आपकी इस सार्थक स्वीकारोक्ति पर पूरा फिट बैठता है...सच जब भी बेबाक़ी से बोला जाये ख़ूबसूरत लगता है ठीक वैसा ही जैसी आपकी यह पोस्ट....
    साधूवाद.......

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